डिजिटल अरेस्ट स्कैम (Digital Arrest Scam) पर CBI को राष्ट्रीय जांच का निर्देश
खबर का मूल — क्या हुआ?
- Supreme Court of India (सुप्रीम कोर्ट) ने सोमवार को आदेश दिया कि “डिजिटल अरेस्ट” नामक साइबर फ्रॉड मामलों की जांच पूरे भारत में Central Bureau of Investigation (CBI) करे। (The Tribune)
- अदालत ने उन राज्यों से अनुरोध किया है — जिनमें पूर्व में CBI को सार्वभौमिक (general) सहमति नहीं दी गई है — कि वे इन मामलों की जांच के लिए सहमति दें। (The Tribune)
- साथ ही, अदालत ने Reserve Bank of India (RBI) को नोटिस भेजा है और पूछा है कि क्यों बैंक खाते फ्रॉडर्स द्वारा उपयोग में लाए जाने पर AI या मशीन-लर्निंग टूल का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। (The Tribune)
डिजिटल अरेस्ट स्कैम — कैसे होती है धोखाधड़ी?
“डिजिटल अरेस्ट” एक आधुनिक साइबर फ्रॉड है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, कोर्ट, सरकारी एजेंसी या जांच विभाग का अधिकारी बताकर पीड़ितों (अक्सर बुज़ुर्गों) को वर्चुअल कॉल करते हैं — वीडियो या ऑडियो के माध्यम से। उन्हें यह कहकर डराया जाता है कि उनका बैंक खाता, SIM या पहचान अपराध में इस्तेमाल हुआ है। फिर उन्हें “डिजिटल गिरफ्तारी” या गिरफ्तारी की धमकी दी जाती है। (Indian Masterminds)
अपराधी अक्सर फर्जी दस्तावेज, कोर्ट या एजेंसी के नाम की स्क्रीन्सhots, कस्टम थ्रेट्स आदि दिखाते हैं, ताकि आरोप वास्तविक लगे। फिर वे पैसों की मांग करते हैं — बैंक ट्रांसफर, फाइन या “सुरक्षा जमा” — और खाते को “फ्रीज” कराने की धमकी देते हैं। (Indian Masterminds)
ऐसे मामलों में कई बार पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र आदि राज्यों में वरिष्ठ नागरिक बड़ी रकम गंवा चुके हैं — असल में वे फ्रॉड का शिकार हुए होते हैं। अदालत ने कहा है कि इस तरह की वर्चुअल गिरफ्तारी और फर्जी मुकदमों से जनता का भरोसा न्याय-व्यवस्था पर खतरे में है। (Hindustan Times)

अदालत ने क्या निर्देश दिए हैं — विस्तृत उपाय
- CBI को यह स्वतंत्रता दी गई है कि वह न सिर्फ फ्रॉडर्स, बल्कि उन बैंक अधिकारियों और बैंक खातों की भी जांच कर सके जो “mule accounts” के ज़रिए अपराधियों की मदद करते हों। (Business Standard)
- सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों + उनकी पुलिस व साइबरक्राइम यूनिटों को निर्देश दिया गया है कि वे CBI से पूरा सहयोग करें। (The New Indian Express)
- टेक्नोलॉजी और बैंकिंग फ्रॉड से निपटने के लिए राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया है कि वे साइबर-क्राइम के लिए राज्य स्तरीय समन्वय केन्द्र (cyber-crime coordination centres) बनाएं। (The Tribune)
- यदि जरूरत पड़ी, CBI को विदेशों में बैठे अपराधियों तक पहुँचने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहभागिता (जैसे INTERPOL) की मदद लेने के निर्देश दिए गए हैं। (The Tribune)
भारत में क्यों ज़रूरी था यह कदम?
पिछले कुछ सालों में “डिजिटल अरेस्ट” नामक फ्रॉड में तेजी से वृद्धि हुई। जानकारी के अनुसार, देश में करीब ₹3,000 करोड़ से अधिक की ठगी की रिपोर्टें आई हैं, जिसमें ज्यादातर शिकार वरिष्ठ नागरिक रहे। (The Tribune)
ऐसे धोखाधड़ी के चलते लोगों में डर और असुरक्षा की भावना पनप रही थी — उनका भरोसा न सिर्फ बैंकिंग व्यवस्था पर, बल्कि पुलिस-सिस्टम और न्यायालय पर भी डगमगा रहा था। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक बड़े और संगठित साइबर फ्रॉड के ख़िलाफ निर्णायक़ कार्रवाई की दिशा में एक अहम कदम है।
निष्कर्ष:
डिजिटल दुनिया में अपराध का तरीका बदल चुका है — अब धोखाधड़ी “वर्चुअल गिरफ्तारी” और डर के ज़रिए हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बढ़ते साइबर अपराध के विरुद्ध CBI को राष्ट्रीय जांच एजेंसी बनाकर, राज्यों और केंद्रीय संस्थानों से सहयोग का आदेश दिया है। यदि राज्यों ने बिना देरी किए सहमति दी, और बैंकिंग, तकनीकी संस्थाएं सही दिशा में कदम उठाएँ — तो इस घातक फ्रॉड से कई लोगों को सुरक्षित किया जा सकता है।
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